हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार,आयतुल्लाहिल उज़्मा जवादी आमोली ने रमज़ान मुबारक के आगाज़ से पहले मुबल्लेग़ीन को एक लिखित संदेश में कहा,रमज़ान मुबारक के महीने में जहाँ तक आपकी क्षमता हो अल्लाह के लिए सफ़र करें प्रवासन करें, ताकि ﴿لِیُنْذِرُوا قَوْمَهُمْ إِذا رَجَعُوا إِلَیْهِمْ﴾ वे अपनी क़ौम को नसीहत करें जब वे उनकी तरफ़ लौटें) इस पर अमल हो सके। इस वक़्त पूरा ईरान आपकी बातों को सुनने के लिए बेताब है।
ख़ुदा न करे कि किसी गाँव में रमज़ान मुबारक के महीने में कोई मुबल्लिग़ मौजूद न हो अगर मुमकिन हो तो बुज़ुर्गी का मुज़ाहिरा करें और गाँव वग़ैरह की भी तब्लीग़ी दावत को सकारात्मक जवाब दें।
उन्होंने आगे कहा,आप जहाँ भी जाएँ या तो एक रिसाला लिखें या किसी रिसाले का अध्ययन ज़रूर करें यानी हौज़ा-ए-इल्मिया को अपने साथ लेकर जाएँ।
वरना अगर इंसान एक महीने से ज़्यादा तदरीस (पढ़ाई) और बहस को छोड़ देगा, तो यह बहुत मुश्किल हो जाएगा अगर किसी जगह तलबा (छात्र) मौजूद हों तो उनके लिए एक सबक़ (क्लास) का एहतमाम ज़रूर करें।
अगर आप अकेले हों तो शेख़ मुफ़ीद या इमाम ख़ुमैनी अ.ल. जैसे बुज़ुर्गों के छोटे या बड़े रिसालों से लाभ उठाए आखिर बहुत से रिसाले मौजूद हैं चाहे वे फ़ारसी हों अरबी हों, संक्षिप्त हों, विस्तृत हों, फ़िक़्ही हों, रिवायती हों या तफ़सीरी उनसे लाभ उठाएँ, ताकि आपका काम इल्मी और असरदार हो। इंशाअल्लाह, तब्लीग़-ए-इलाही के ज़रिए निज़ाम-ए-इलाही की रक्षा करें।
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